स्नातकोत्तर महाविद्यालय मलिकपुरा
ग्राम्यांचल की शैक्षिक चेतना को आलोकित करने वाली पावन संस्था स्नातकोत्तर महाविद्यालय मलिकपूरा, गाजीपुर अपने उद्भव से ही शिक्षा-संस्कार और समाजोन्नति का संगम प्रस्तुत करती रही है। यह महाविद्यालय गाजीपुर जनपद मुख्यालय से लगभग 21 किलोमीटर दूर, मगही नदी के रमणीय तट पर, महावीर जी के मंदिर एवं संत खाकी बाबा की तपःकुटी के आशीर्वादमय परिसर में अवस्थित है। प्रकृति की शांति और अध्यात्म की वासना से ओत-प्रोत यह वातावरण शिक्षा के लिए एक आदर्श पृष्ठभूमि निर्मित करता है।
इस महाविद्यालय की स्थापना का स्वप्न बाबू भगवान सिंह जी जैसे दूरदर्शी समाजसेवी ने देखा। उन्होंने शिक्षा को केवल निजी उन्नति का साधन न मानकर ग्राम्य समाज की आत्मनिर्भरता और जागरूकता का पथप्रदर्शक माना। इसी दृष्टि से उनके प्रेरक मार्गदर्शन और त्यागपूर्ण प्रयासों से 2 अक्टूबर 1956 को इस संस्था की नींव रखी गई और सन् 1973 से इसे शासकीय अनुदान प्राप्त हुआ और तभी से इसकी शैक्षणिक यात्रा व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ी। प्रारम्भ में महाविद्यालय केवल स्नातक स्तर की शिक्षा तक सीमित था, किंतु कालक्रम में यह वटवृक्ष की भाँति विकसित होकर आज स्नातकोत्तर स्तर तक सुचारु रूप से संचालित हो रहा है।
आज इस महाविद्यालय में आयोग से चयनित प्राचार्य सहित कुल 21 शिक्षक और 07 गैर-शैक्षणिक कर्मचारी अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। भाषा, वाणिज्य और मानविकी-इन तीनों संकायों का संचालन यहाँ बड़े ही अनुशासित और सुव्यवस्थित ढंग से हो रहा है। शांत एवं अनुशासित शैक्षिक वातावरण, समृद्ध पुस्तकालय, आधुनिक कक्षाएँ और विविध सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का आधार बनती हैं। संस्था के आदर्श वाक्य 'विद्यैव बलम्' (विद्या ही वास्तविक बल है) को आत्मसात् करते हुए यहाँ शिक्षा को केवल पाठ्यक्रमीय उपलब्धि तक सीमित न रखकर संस्कार और उत्तरदायित्व से भी जोड़ा जाता है। महाविद्यालय का ध्येय है कि विद्यार्थी ज्ञान, संस्कार और आत्मबल से संपन्न होकर आदर्श नागरिक बनें और समाज व राष्ट्र की उन्नति में योगदान दें। इसी का पर्याय है कि हमारे संस्था के छात्र राष्ट्र के विभिन्न पदों पर सेवारत हैं। महाविद्यालय आत्मबल, संस्कार और ज्ञान की परंपरा को बनाए रखते हुए निरंतर सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों का आयोजन करता रहा है, जिससे विद्यार्थियों में सर्वांगीण विकास और व्यक्तित्व संवर्धन की भावना उत्पन्न होती रहे।
बाबू भगवान सिंह जी का जीवन-दर्शन शिक्षा को समाजोन्नति का सर्वश्रेष्ठ साधन मानता था। उनका विश्वास था कि शिक्षा ही व्यक्ति को ज्ञान, विवेक और आत्मबल से परिपूर्ण बनाती है। आज भी यही दृष्टि महाविद्यालय की कार्यप्रणाली में परिलक्षित होती है। यहाँ विद्यार्थियों को केवल विषयगत प्रवीणता ही नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना से भी संपन्न बनाने का सतत प्रयत्न किया जाता है।
संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने ग्राम्य अंचल के उन विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खोले, जिनके लिए यह कभी एक दूर का सपना था। यहाँ से शिक्षा प्राप्त कर असंख्य छात्र-छात्राएँ जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता अर्जित कर रहे हैं और समाज में महाविद्यालय का गौरव बढ़ा रहे हैं। इस महाविद्यालय का परिचय केवल ईंट-पत्थर की इमारतों से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्यों, मूल्यों और आदर्शों से है। यहाँ का प्रत्येक कक्षा-कक्ष, प्रत्येक पुस्तक, प्रत्येक शिक्षक और प्रत्येक गतिविधि उस मौलिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें शिक्षा और संस्कार का समन्वय है। ग्रामीण परिवेश में स्थित होकर भी यह संस्था आधुनिकता और परम्परा का संतुलित संगम प्रस्तुत करती है।
आज जब शिक्षा व्यवस्था में व्यावसायिकता की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब स्नातकोत्तर महाविद्यालय मलिकपूरा, गाजीपुर अपनी सादगी, समर्पण और मूल्यनिष्ठ दृष्टि से विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। यह केवल शिक्षा का केन्द्र नहीं, बल्कि उस परम्परा का संरक्षक है जो शिक्षा को समाज सेवा, नैतिकता और आत्मबल से जोड़ती है। इस प्रकार यह महाविद्यालय न केवल गाजीपुर जिले के लिए, बल्कि समूचे पूर्वांचल के लिए शिक्षा का दीपक है। यह दीपक आने वाली पीढ़ियों को आलोकित करेगा, उनमें आत्मबल और आत्मगौरव जगाएगा और समाज को समरसता तथा प्रगति की ओर ले जाएगा।